"कोई भी देश सच्चे अर्थों में तब तक स्वतंत्र नहीं है, जब तक वह अपनी भाषा में नही बोलता|"

"यदि भारत को राष्ट्र बनाना है, तो चाहे मानें या न मानें, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है|"

"विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा की हिमायत करनेवाले जनता के दुश्मन हैं|"

-मोहनदास करमचंद गाँधी

                                           दो शब्द

मानव समाज के ऐतिहासिक विकास-क्रम में भाषा मनुष्य का सर्वाधिक क्रांतिकारी आविष्कार है | भाषा की संरचना से साहित्य-सृजन होता है|  राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए भाषा का, राष्ट्रभाषा के रूप में विकसित रूप एक आवश्यक साधन होता है, जिसके माध्यम से देश बनता है, राष्ट्र के मनोजगत  को परिष्कृत एवं संस्कारित किया जाता है| यह सच्चाई है कि शिक्षा और संस्कृति की सत्ता एक व्यापक स्तर पर भाषा एवं उसकी अभिव्यक्ति पर निर्भर होती है| आधुनिक विश्व के राष्ट्र-राज्यों में राष्ट्रभाषा की सर्वोपरि महत्ता स्वयं सिद्ध है जिसकी बुनियाद पर विश्व के अनेक राष्ट्रों ने साम्राज्यवादी सत्ताओं के विरुद्ध सफल संघर्ष किया है| इसलिए हिन्दी साहित्या सम्मेलन, प्रयाग ने बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण से लेकर आज तक विगत सौं वर्षों से हिन्दी भाषा और साहित्या के प्रचार-प्रसार तथा उन्नयन का महत्तर दायित्व पूरी क्षमता, गत्यात्मकता और जीवंतता के साथ निभाया है|
    सम्मेलन को इन  वर्षों में अनेक प्रकार के झंझावातों का सामना करना पड़ा है ! लेकिन ये अंतरराष्ट्रीय संस्था, प्रभुद्ध भाषानुरागियो के सहयोग से वटवृक्ष की भाँति धैर्यपूर्वक, अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए गौरवशाली परम्परा निर्वहन करती रही है| सौ वर्षों की सजग सक्रियता ऐसी सांस्कृतिक अराजनीतिक संस्था के लिए ऐतिहासिक महत्व रखती है| जिसका विवरण इस लघुपुस्तिका में समाहित करना संभव नही है और फिर भी आपके हाथों में हम सहर्ष सौंप रहे हैं ताकि सम्मेलन का एक सामान्य परिचय आपको सुलभ हो सके|  

हिन्दी साहित्य सम्मेलन का संक्षिप्त परिचय

राष्‍ट्रीय भावना के नवोन्मेष के लिए राष्ट्रभाषा और साहित्य की भूमिका निर्णायक महत्व से युक्त होती है| इस मान्यता की आधारभूमि पर निरंतर सक्रिय 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने तथा हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि का व्यापक प्रचार करने के उद्देश्य से 1 मई १९१० की बैठक में अखिल भारतीय स्तर पर एक साहित्य सम्मेलन आयोजित करने का निश्चय किया| तदनरुप दिनांक 10 अक्टूबर से 12 अक्टूबर १९१० ई0 तक प्रथम ऐतिहासिक सम्मेलन काशी में सम्पन्न हुआ जिसमें भारत के प्रायः सभी प्रदेशों के साहित्यकारों, हिन्दी हितैषियों और प्रतिनिधियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया| सम्मेलन में सम्मिलित लोगों को अधिवेशन की सफलता ने बहुत प्रभावित किया जिसके परिणामस्वरूप राजर्षि पुर्षोत्तम दास टंडन का इस आशय का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया कि इस प्रकार के सम्मेलन प्रतिवर्ष भारत के विभिन्न स्थानों में किए जायें| यह भी निश्चय किया गया कि आगामी अधिवेशन प्रयाग में किया जाय| आगामी अधिवेशन तक के लिए 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' नाम की एक समिति बना दी गई, जिसके प्रधानमंत्री राजर्षि पुरषोत्तमदास टण्डन नियुक्त किए गये. इस प्रकार 10 अक्टूबर सन् १९१० को हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हो गयी और 'सम्मेलन' का आगामी अधिवेशन प्रयाग में होना निश्चित हुआ समिति के प्रधानमंत्री भी प्रयाग के निवासी थे, इसलिए एक वर्ष के लिए सम्मेलन का अस्थायी कार्यालय प्रयाग चला आया. सम्मेलन का द्वितीय अधिवेशन प्रयाग में सन् 1911 ई0 में हुआ जिसमें पंडित गोविन्दनारायण मिश्र ने सभापति का दायित्व निभाया| यह अधिवेशन भी प्रत्येक दृष्टिकोण से पूर्णतः सफल रहा| श्रधेय टंडन जी की असाधारण कार्यक्षमता और हिन्दी भाषा के प्रति अगाध निष्ठा का परिणाम यह हुआ कि सम्मेलन स्थायी हो गया और इसका कार्यालय भी स्थाई रूप से प्रयाग में आ गया|
    वस्तुतः प्रत्येक समाज में, प्रत्येक युग में ऐसे व्यक्ति होते रहे हैं जिनमें सामान्यजन से कुछ भिन्न प्रकार की उच्चस्तरीय बुद्धि, प्रतिभा, सांगठनिकक्षमता और अभिव्यक्तिक्षमता रही है जो समुदाय और राष्ट्र के लिए नूतन हितकारी लक्ष्य निर्धारित करतें हैं और संभावनाओं से अवगत कराते हैं| हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पंडित मदनमोहन मालवीय, भारतरत्न पुरुषोत्तमदास टण्डन, महात्मा गाँधी, डॉ0 राजेंद्र प्रसाद और डॉ0 प्रभात शास्त्री इसी कोटि के सुभचिंतक नायक रहे हैं|
भारतीय संस्कृति की विधेयात्मक परम्परा, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता की भावना का पुनर्जागरण करनेवाले महामना पं0 मदनमोहन मालवीय भारत वर्ष के नेताओं में कर्तव्यपरायणता, दूरदर्शिता, वर्तित्वक्षमता एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति समर्पित अनन्य निष्ठा के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखते थे| तत्कालीन भारत में हिन्दी को राष्ट्रभाषा पद पर अभिषित करने का स्वपन देखनेवाले नेताओं में अनेक महापुरुष थे लेकिन इस कार्य के लिए सविनय आंदोलन करके मालवीय जी ने ब्रिटिश शासन-कर्ताओं से ही अँग्रेज़ी के दुर्ग में हिन्दी का प्रवेश कराया| उन्होने संयुक्त प्रांत कचहरियों और प्राथमिक पाठशालाओं में हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि को व्यवहार में लाने के लिए साठ हज़ार लोगों के हस्ताक्षर से युक्त प्रतिवेदन सौंपा जिससे सम्बंधित राजाज्ञा 15 अप्रैल सन् 1900 ई0 को जारी हुई| यह मालवीय जी का अमूल्य योगदान था जिसके फलस्वरूप संपूर्ण हिन्दी-जगत् में उनका यश प्रसरित हो गया था वे एक प्रखर हिन्दी-हितैषी के रूप में सर्वज्ञ सम्मान्य हो गये| उनका विचार था - "मेरी अभिलाषा है कि सभी शिक्षा संस्थाओ में छात्र हिन्दी पढ़ें| यूरोपीय इतिहास, काव्य, कला-कौशल आदि की पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद किया जाय| देशभक्ति सर्वोच्च धर्म है और हिन्दी सेवा सबसे बड़ी सेवा| सभी शिक्षा-संस्थाओं में शिक्षा का माध्यम हिन्दी होना चाहिए|"
    काशी में 10-12 अक्टूबर १९१० ई0 में संपन्न हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम वार्षिक अधिवेशन में सर्वसम्मति से मालवीय जी को सभापति बनाया गया| शारदीय नवरात्र के पुण्य क्षण में संपन्न इस अधिवेशन में मालवीय ने अध्यक्षीय भाषण में हिन्दी के विकासात्मक स्वरूप, ऐतिहासिक स्थिति, अन्य भारतीय भाषाओं से समकक्षता, हिन्दी भाषियों का अपनी भाषा के प्रति दायित्व, हिन्दी-उर्दू संबंध तथा हिन्दी भाषा के प्रयोग पर अपना अभिमत प्रकट किया| सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन में ही मालवीय जी ने हिन्दी-भाषी लेखकों, बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं एवं साधारण नागरिकों के भाषाई कर्तव्यों को रेखांकित कर दिया| भाषाई कर्तव्यों का यह रेखांकन ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य बना| मालवीय जी ने सम्मेलन के १९१९ ई0 के नवें मुंबई अधिवेशन का भी सभापतित्व किया था| उन्होने इस अधिवेशन में पुनः स्पष्ट शब्दों में उद्घोष किया कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन का उद्देश्य हिन्दी की उन्नति करना एवं देवनागरी लिपि में लिखी हुई हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाना है.
    'सम्मेलन के प्राण' राजर्षि भारतरत्न पुरुषोत्तमदास टंडन ने महामना मालवीय जी की पुनीत आज्ञा शिरोधार्य करके आजीवन हिन्दी सेवा का व्रत लिया| अपराजेय हिन्दी-निष्‍ठा के प्रतीक- पुरुष टंडन जी प्रायः कहते थे - "सम्मेलन मेरे प्राणों में समा गया है|" टंडन जी सम्मेलन के स्थापना वर्ष में ही प्रथम प्रधानमंत्री सर्वसम्मति से चुने गये| इस प्रकार संस्था के जन्मकाल से ही हिन्दी हितैषियों की सूक्ष्मदृष्टि से टंडन जी का उत्कट हिन्दी-प्रेम छिपा ना रह सका| तत्कालीन भारत में हिन्दी भाषा की सेवा, उसके यथाविद प्रचार-प्रसार और उचित स्वतवों की संपूर्ति के लिए जीवनव्यापी संघर्ष-पथ का पथिक होना अत्यधिक कंटकाकिर्ण था किंतु हिन्दी सेवा का उनका अविचल निश्चय उनके जीवन का प्रेरक-तत्व बन गया| उन्होने राष्ट्रभाषा के प्रचार, उत्थान और संवर्धन में अतुलनीय योगदान किया| अपने उच्चादर्श, सिद्धांत निष्ठा और त्यागमय चरित्र की बुनियाद पर टंडन जी सम्मेलन के सतत कर्मशील कर्णधार बने रहे| वे १९१० से १९२० ई0 तक सर्वसम्मति से सम्मेलन के प्रधानमंत्री रहे और प्रथम अधिवेशन से १९५१ ई0 तक सम्मेलन के सभी अधिवेशनों में वे सम्मिलित रहे| भारत रत्न राजर्षि टंडन जी कानपुर में १९२३ ई0 में संपन्न सम्मेलन के तेरहवें अधिवेशन के सभापति रहे| उन्होने हिन्दी सेवा के लिए अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं और सम्भावनाओं को त्रिन्वत त्याग कर 'राजर्षि' व्रत धारण किया|
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अनुभव किया कि स्वतंत्रता आंदोलन के लिए, राजनीतिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए व्यवहार में आने वाले मंच पर और अपने अंतः प्रादेशिक व्यवहार के लिए विदेशी भाषा का व्यवहार करना नितांत लज्जाजनक, दासता और दरिद्रता का लक्षण है| अतः भारत की किसी सर्वाधिक प्रचलित सरल और सारवबोधगम्य भाषा को अपनाना सर्वथा उचित है| वह गुण एक मात्र हिन्दी में है और इसीलिए इसे राष्ट्रभाषा बनाना है| वो कहते थे - "मेरे लिए हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है| जो राष्ट्र अपनी भाषा का अनादर करता है वह अपनी राष्ट्रीयता खो देता है|" इस वचन को १९१६ ई० के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में हिन्दी में भाषण देकर कर्म में परिवर्तित किया| राष्ट्रभाषा के प्रसंग में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की महनीय भूमिका से गाँधी जी ऐसे अभिभूत थे कि इंदौर में होनेवाले सम्मेलन के दो अधिवेशनों की अध्यक्षता उन्होंने सहर्ष स्वीकार की जबकि अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के एकछत्र, सर्वमान्य, राष्ट्रीय नेता होने के बावजूद उन्होने कांग्रेस पार्टी में कभी कोई पद स्वीकार नही किया| सम्मेलन के आठवें अधिवेशन-इंदौर १९१८ ई० में अध्यक्षीय भाषण में महात्मा गाँधी ने कहा - "भाषा, माता के समान है| माता पर हमारा जो प्रेम होना चाहिए वह हम लोगों में नहीं है| आप जो स्वतंत्रता चाहते हैं वह विदेशी भाषा से नही मिल सकती| मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का गौरव प्रदान करें| हिन्दी सब समझते हैं, इसे राष्ट्रभाषा बनाकर हमे अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए| राष्ट्रभाषा हिन्दी की क्षमता, उपयोगिता तथा सार्थकता निर्विवाद है|" इस अवसर पर दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का संकल्प किया गया और इस दिशा में सम्मेलन ने अगला कदम बढ़ाया|
सम्मेलन के चौबीसवें अधिवेशन (इंदौर १९३५ ई०) में भी गाँधी जी ने अध्यक्षता की और हिन्दी के लिए अपनी प्रतिबद्धता दुहराई| उन्होने कहा - "अगर हिन्दुस्तान को सचमुच एक राष्ट्र बनाना है तो चाहे कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी हे बन सकती है| हमारी लिपि देवनागरी हे हो सकती है क्योंकि यही लिपि संपूर्ण और सर्वश्रेष्ठ है|"
१९३६ ई० में सम्मेलन के नागपुर अधिवेशन के सभापति देशरत्न डॉ० राजेंद्र प्रसाद ने कहा - "हिन्दी साहित्य सम्मेलन एक बड़ी संस्था है, इसके उद्देश्य बहुत ऊंचे है और राष्ट्रनिर्माण का एक बहुत बड़ा अंग इसके ज़िम्मे है|" नागपुर के इस अधिवेशन में यह प्रस्ताव स्वीकार किया गया कि हिन्दी प्रचार करने के लिए 'हिन्दी प्रचार समिति' का गठन हो जिसका कार्यालय वर्धा में हो| १९३८ में शिमला अधिवेशन में काका कालेलकर के सुझाव पर सम्मेलन ने इसका नामकरण 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा' कर दिया और डॉ० राजेंद्र प्रसाद जी आजीवन सम्मेलन से जुड़े रहे और इसके संवर्धन में अपना योगदान देते रहे|
पुरुषोत्तम दास टंडन के पश्चात सम्मेलन का कार्य-भार नियमावली के अनुसार चौदह निर्वाचित प्रधानमंत्रियों ने संभाला और सम्मेलन अपने लक्ष्य की ओर निरंतर गतिशील रहा| साहित्य सम्मेलन स्वतंत्रता-संघर्ष का एक साधन था लोकिन स्वतंत्रता के बाद जैसे-जैसे सरकारीकरण या सरकारी हस्‍तक्षेप बढ़ता गया वैसे-वैसे स्वैच्छिक संगठनों की प्रकृति भी उसी गति से क्षीण से क्षीणकर होती चली गयी| राजनीतिक दुर्भिसंधियों के द्वारा सम्मेलन की स्वायत्तता का अपरहण किया गया और यह सरकारी तंत्र की छत्र-छाया में स्वेच्छाचारी कार्याधिकारियों का प्रबंधतंत्र बन गया तथा उसका देशव्यापी धरातल संकुचित होकर राजधानी का व्रितचक्र बन गया| सम्मेलन के संकट का यह काल दो दशको से भी अधिक समय तक छाया रहा| इस परिस्थिति में एक ऐसे हिन्दी-हितैषी व्यक्ति ने दृढ़ संकल्प के साथ संघर्ष-पथ का अनुसरण किया जो सर्वतोभावेन सम्मेलन के प्रति समर्पित था| उसे भली भाँति ज्ञात था कि अन्याय विरोध से दबता है, समझौतों से नही और न्याय विरोधों से शक्ति पाकर आग में सोने की तरह और चमकता है| उस महापुरुष ने विधि-सम्म्त मार्ग अपनाकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक सम्मेलन से शासन तंत्र का शिकंजा हटाने के लिए अपील किया और सम्मेलन के लोकतांत्रिक स्वरूप को पुनः वापस दिलाया और इस राष्ट्रीय संस्था को जनाधार के सहारे पुनर्जीवित किया, वे महान आत्मपुरुष थे - डॉ० प्रभात शास्त्री| सम्मेलन के उन्नायक डॉ० प्रभात शास्त्री संस्कृत साहित्य के प्रकांड विद्वान थे लेकिन उन्होने राष्ट्रभाषा की महनीयतको हृदयंगम करके अपने जीवन के पाँच दशकों से भी अधिक का समय हिन्दी सेवा के लिए अर्पित किया| वे १९७५ से १९७८ तक और १९८० से १९९९ तक सम्मेलन के प्रधानमंत्री रहे| सम्मेलन के उन्नायक शास्त्री जी ने देश के विभिन्न भागों, विशेष रूप से हिन्दीतर क्षेत्रों में सम्मेलन के अधिवेशनों का आयोजन करके जनता को हिन्दी के प्रति जागरूक बनाया| प्रत्युतपन्नंति से संपन्न डॉ० प्रभात शास्त्री की सांगठनिकक्षमता विस्मयकारी थी| वे ओजस्वी वक्ता थे| डॉ० शास्त्री जी ने सम्मेलन का संचालन करते हुए भारतीय संस्कृति के अनुपम ग्रंथ पुराणों का अनुवाद कराया| सम्मेलन संग्रहालय में अनेक दुर्लभ ग्रंथों एवं हस्तलिखित पोथियो का विशाल भंडार उनकी शोधपरक दृष्टि और ज्ञानोन्मुखी अभिरुचि का प्रमाण है|

सम्मेलन का उद्देश्य

सम्मेलन का उद्देश्य हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभी अंगो की पुष्टि और उन्नति का प्रयत्न करना, राष्ट्रलिपि देवनागरी और राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना, हिन्दी भाषा को अधिक सरल, सुगम और समृद्ध बनाना, हिन्दी भाषी प्रदेशों में सभी सरकारी-अर्धसरकारी व गैर सरकारी तंत्रों में हिन्दी का प्रयोग करना, हिन्दी के लेखकों-रचनाकारों को समय-समय प्र पारितोषिक, प्रशंसापत्र और उपाधि आदि से सम्मानित करना, हिन्दी भाषा की उन्नति के लिए महाविद्यालय-विश्वविद्यालय की स्थापना करना, पुस्तकें प्रकाशित करना, हिन्दी-संस्कृत की पांडुलिपियों व प्राचीन-अर्वाचीन पुस्तकों का संग्रह कर उसके लिए एक संग्रहालय की व्यवस्था करना, हिन्दीतर प्रदेशों में संपर्क भाषा के रूप में अँग्रेज़ी के स्थान पर हिन्दी के प्रयोग के लिए प्रेरित करना तथा हिन्दीतर भाषा की मूल्यवान कृतियों का हिन्दी में अनुवाद करना आदि है|

लोकतांत्रिक प्रणाली

सम्मेलन में 'भारतीय संसद' की ही भाँति लोकतांत्रीय प्रणाली है जिसे 'स्थाई समिति' नाम दिया गया है| इसका कार्यालय ५ वर्ष के लिए होता है| स्थाई समिति में विभिन्न चुनाव क्षेत्रों से लोकतांत्रिक रूप से चुने हुए प्रतिनिधि आते हैं और वही 'सत्र-सभापति', 'प्रधानमंत्री' व अन्य मंत्रियों का चुनाव करते हैं|